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किसान उपन्यास : आन्दोलन

दुनिया के सारे परिवर्तनकारियों, आन्दोलनकारियों, क्रान्तिकारियों, दार्शनिकों और किसानों को सादर समर्पित...                             1. सचिन गर्मियों की छुट्टियों में स्कूल से बहुत दिनों बाद घर लौटा था। वो अभी बुन्देलखण्ड किसान स्कूल, ओरछा से हाईस्कूल कर रहा था और वहीँ हॉस्टल में रहता था। जब शाम को वो अपने दद्दा - बाई के संगे बैठा था तब दद्दा - बाई आपस में चर्चा कर रहे थे - दद्दा : "अरे! राम - राम...भौत बुरओ भओ आज दुपरे, रामदीन ने आम के पेड़ सें लटककर फाँसी लगा लई। तभी उसी के खेत के पास सिया काकी भेड़ - बकरियाँ चरा रहीं थीं। उसने जैसे ही देखा कि रामदीन भज्जा फाँसी पर झूल रहे हैं तो वह भौत डर गई। डर के मारे वो पसीने से तर - तर हो गई। पसीने में लतपथ काकी भेड़ - बकरियों को ऐसे ही छोड़कर भागते - भागते गाँव आ गई तभी हम औरें माते के चौंतरा पर ताश खेल रहे थे। जैसे ही सिया काकी ने बताया कि रामदीन भज्जा ने बड़े हार में फाँसी लगा लई तो हम आठ - दस जनें भागते - भागते पहुँच गए। जेठ मास की दुपज्जा में उतै चिरज्जा तक न दिख रई त...

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